आचार्य आशीष मिश्र Reply जून 04, 2025
```html विंध्य की प्राचीन धरोहर: रीवा (सभी एनिमेशन बहाल)

विंध्य की प्राचीन धरोहर: रीवा की वनवासी सभ्यताएँ, राजवंश एवं सांस्कृतिक संगम

रीवा का प्रारंभिक काल: वनवासी सभ्यताएँ, प्राचीन राजवंश एवं बहु-सांस्कृतिक विरासत की गहन पड़ताल

शोध एवं संपादन: आचार्य आशीष मिश्र

भारत के हृदयस्थल में स्थित, मध्य प्रदेश का रीवा संभाग, अपनी विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की नैसर्गिक सुषमा और ऐतिहासिक गहनता के लिए विख्यात है। इसका इतिहास प्रागैतिहासिक काल से लेकर विभिन्न राजवंशों के उत्थान-पतन और एक समृद्ध बहु-सांस्कृतिक विरासत तक फैला हुआ है। यह आलेख रीवा के इसी प्रारंभिक काल, इसकी गहन वनवासी सभ्यताओं, प्राचीन राजवंशों के योगदान, और उस बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है जिसने बघेलों के आगमन से पूर्व इस क्षेत्र को समृद्ध किया।

रीवा एवं बघेलखण्ड क्षेत्र का ऐतिहासिक मानचित्र

(चित्र: रीवा एवं बघेलखण्ड क्षेत्र का ऐतिहासिक मानचित्र जिसमें प्रमुख पुरातात्त्विक स्थल और प्राचीन राजवंशों के प्रभाव क्षेत्र को इंगित किया गया है।)

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प्रस्तावना: रीवा की प्राचीन ऐतिहासिक यात्रा का आरंभ

भारत के हृदयस्थल में स्थित, मध्य प्रदेश का रीवा संभाग, अपनी विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की नैसर्गिक सुषमा और ऐतिहासिक गहनता के लिए विख्यात है। यह क्षेत्र मात्र एक भौगोलिक इकाई नहीं, अपितु सहस्राब्दियों से प्रवाहित हो रही भारतीय सभ्यता की एक जीवंत धारा का साक्षी है। इसका इतिहास केवल यशस्वी बघेल वंश की कीर्ति तक ही सीमित नहीं है; वस्तुतः, इसकी जड़ें प्रागैतिहासिक काल के धुंधलके में विलीन हैं, जहाँ आदिमानव के प्रथम पदचिह्न अंकित हुए।

कालचक्र के आवर्तनों के साथ, इस पावन भूमि ने वैदिक ऋचाओं की गूंज सुनी, चेदि महाजनपद की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को देखा, मौर्यों के साम्राज्यिक विस्तार का अनुभव किया, शुंगों की सांस्कृतिक निष्ठा को परखा, नागों की क्षेत्रीय शक्ति का अवलोकन किया, गुप्तों के स्वर्णयुग की आभा से यह आलोकित हुई, और कल्चुरियों, चंदेलों तथा प्रतिहारों जैसे पराक्रमी राजवंशों के उत्थान और पतन का मूक दृष्टा बनी। इन राजवंशों ने न केवल यहाँ की राजनीतिक नियति को आकार दिया, बल्कि कला, स्थापत्य और धर्म के क्षेत्र में अपनी अमिट विरासत भी छोड़ी।

परंतु, रीवा का इतिहास केवल राजमहलों और विजय अभियानों का लेखा-जोखा मात्र नहीं है। इसकी आत्मा यहाँ के मूल निवासियों – कोल, गोंड जैसी वनवासी जनजातियों, और लोधी (लोध)लवाना जैसे लोकजातीय समूहों की जीवंत संस्कृति में बसती है। इन समुदायों ने प्रकृति के साथ एक सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित करते हुए इस भूमि की सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को एक विशिष्ट और अनूठी पहचान प्रदान की। उनकी लोककथाएँ, उनके नृत्य, उनके पर्व और उनकी जीवन-शैली आज भी इस क्षेत्र की विरासत का अभिन्न अंग हैं। यह भूमि विभिन्न धर्मों और आस्थाओं की संगम स्थली रही है, जहाँ शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध और मध्यकालीन सूफी परंपराओं ने एक साथ पल्लवित होकर एक अद्भुत सर्वधर्म समभाव और सांस्कृतिक समन्वय का वातावरण निर्मित किया। प्रस्तुत विस्तृत आलेख रीवा के इसी प्रारंभिक काल, इसकी गहन वनवासी सभ्यताओं, विभिन्न प्राचीन राजवंशों के योगदान, महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक धरोहरों और उस बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है, जिसने बघेलों के आगमन से पूर्व इस क्षेत्र की नियति को गढ़ा और समृद्ध किया।

रीवांचल की भूमि में दबी हर पुरातात्त्विक खोज, यहाँ की वनवासी संस्कृति की गूंज, और प्राचीन राजवंशों की गाथाएँ, भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को उजागर करती हैं।

1. वनवासी सभ्यताएँ एवं स्थानीय समुदाय: रीवा की आत्मा के संरक्षक

रीवा की प्रारंभिक सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक संरचना की आधारशिला यहाँ की वनवासी और स्थानीय समुदायों ने रखी, जिन्होंने युगों से इस भूमि को अपना घर माना और इसकी पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखा। इनके योगदान के बिना रीवा का इतिहास अधूरा है।

रीवा क्षेत्र की वनवासी संस्कृति का एक प्रतीकात्मक चित्रण (कोल या गोंड जनजाति)

(चित्र: रीवा क्षेत्र की समृद्ध वनवासी संस्कृति का एक प्रतीकात्मक चित्रण।)

कोल जनजाति: विंध्य के मूल प्रहरी और सांस्कृतिक स्तंभ

कोल जनजाति को विंध्याचल क्षेत्र का प्राचीनतम और मूल निवासी समुदाय होने का गौरव प्राप्त है। इनकी सघन बसाहट रीवा, सीधी, सिंगरौली, सतना और उमरिया जिलों में है।

विस्तृत निवास क्षेत्र एवं योगदान:

रीवा जिले के हनुमना, नईगढ़ी, मऊगंज (अब जिला), गुढ़, त्योंथर, सिरमौर, जवा और चोरहटा तहसीलों में इनकी प्रभावशाली उपस्थिति है। कोलगढ़ी (Kolgarhi) (जवा तहसील), अतरैला (Atraila) और डभौरा (Dabhaura) ग्राम कोल संस्कृति के जीवंत केंद्र हैं। कोल समुदाय प्रकृति से जुड़ा रहा है; कृषि, शिकार और वनोपज संग्रहण इनकी आजीविका थे। इनकी सामाजिक व्यवस्था सुदृढ़ और सामूहिकता पर आधारित थी। इनके लोकगीत, लोकनृत्य (जैसे करमा, सैला) और मौखिक कथाएँ अमूल्य धरोहर हैं। वे प्रकृति पूजक रहे हैं (आराध्य देव: बूढ़ादेव, खैरमाई, कोटिल)।

कोल जनजाति की सांस्कृतिक परंपराएँ और प्रकृति के साथ उनका सामंजस्य, रीवांचल की पर्यावरणीय और सामाजिक विरासत का एक अभिन्न अंग है।

गोंड जनजाति: कबीलीय शासन, कलात्मकता और सीधी जिले से विशेष संबंध

गोंड जनजाति मध्य भारत की प्रमुख जनजाति है, जिसका ऐतिहासिक विस्तार सीधी, रीवा और वृहत्तर बघेलखंड में रहा है। विशेषकर सीधी जिले के वनाच्छादित क्षेत्रों और कैमूर श्रृंखला में इनकी ऐतिहासिक उपस्थिति है।

कबीलीय शासन, धार्मिक परंपराएँ एवं कला:

प्रारंभिक काल में गोंडों ने छोटे-छोटे आत्मनिर्भर कबीलीय राज्यों या गढ़ों की स्थापना की थी। वे प्रकृति और पितृ-पूजा में विश्वास रखते हैं, प्रमुख आराध्य देव बड़ा देव (बूढ़ा देव) हैं। उनकी गोंड पेंटिंग विश्वविख्यात है। काष्ठकला, मिट्टी की मूर्तियाँ और धातुशिल्प भी उल्लेखनीय हैं। गोंडवानी कथाएँ और लोकनृत्य (सैला, रीना, करमा, भड़म) इनकी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान हैं।

लोधी (लोध) समाज: परिश्रमी कृषक और वीर योद्धा

लोधी समुदाय मध्यकाल में रीवा क्षेत्र में स्थायी रूप से बस गया और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का स्तंभ बना। इनकी सघन उपस्थिति मऊगंज, जवा, गुढ़, सिरमौर और त्योंथर तहसीलों में रही है। इन्होंने कृषि का विकास किया और सामाजिक-राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बने। इनकी एक गौरवशाली योद्धा परंपरा भी रही है, और इन्होंने स्थानीय शासकों की सेनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लवाना समाज: दूरगामी व्यापार और वाणिज्य के सूत्रधार

लवाना समुदाय ऐतिहासिक रूप से एक गतिशील, खानाबदोश और व्यापारी समुदाय रहा है। ये नमक, अनाज, कपड़े, मसाले आदि के व्यापार में संलग्न थे। रीवा, जो प्राचीन व्यापारिक मार्गों का मिलन बिंदु था, इनके लिए आकर्षण का केंद्र रहा होगा। ये मुख्यतः चाकघाट, त्योंथर और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे क्षेत्रों में निवास करते थे। इन्होंने दूर-दराज के क्षेत्रों के बीच वस्तुओं का परिवहन और विनिमय सुनिश्चित किया और विभिन्न संस्कृतियों तथा विचारों के वाहक बने।

2. बघेल वंश के पूर्ववर्ती राजवंश: रीवा के राजनीतिक क्षितिज के निर्माता

बघेल वंश के १३वीं शताब्दी में उदय से पूर्व, रीवा का भूभाग अनेक शक्तिशाली और प्रभावशाली राजवंशों के शासन और उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा। इन राजवंशों ने न केवल यहाँ की राजनीतिक संरचना को आकार दिया, बल्कि कला, स्थापत्य, धर्म और सामाजिक जीवन पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।

चेदि महाजनपद (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. - महाभारत काल):

प्राचीन रीवा क्षेत्र शक्तिशाली चेदि महाजनपद का अंग था। चेदि नरेश शिशुपाल (महाभारत में उल्लेखित) प्रसिद्ध शासक माने जाते हैं। उनकी राजधानी सुक्तिमती नगरी की पहचान रीवा जिले के इटहा (Itaha) ग्राम से की जाती है। चेदि का भौगोलिक विस्तार व्यापक था और यह तत्कालीन उत्तर भारत की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक इकाई थी।

मौर्य वंश (लगभग 322 ई.पू. – 185 ई.पू.) एवं शुंग वंश (लगभग 185 ई.पू. – 73 ई.पू.):

सम्राट अशोक महान के काल में रीवा क्षेत्र बौद्ध धर्म के प्रसार का प्रमुख केंद्र बना। देउरकोठार (Deur Kothar) के विशाल बौद्ध स्तूप, विहार और अशोककालीन ब्राह्मी शिलालेख इसके महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। यह स्थल रीवा जिले की सिरमौर तहसील में स्थित है। शुंग काल में भी बौद्ध धर्म का प्रभाव इस क्षेत्र में बना रहा।

देउरकोठार के स्तूप और अभिलेख न केवल मौर्यकालीन कला और स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, बल्कि वे सम्राट अशोक की धम्म-नीति और बघेलखण्ड में बौद्ध धर्म की गहरी जड़ों को भी प्रमाणित करते हैं।

नागवंशी (लगभग दूसरी से चौथी शताब्दी ईस्वी):

मौर्यों के पतन के बाद नागवंशियों ने मथुरा, पद्मावती और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में अपनी शक्ति स्थापित की। रीवा-सतना क्षेत्र और बुंदेलखंड से प्राप्त नागवंशी शासकों (जैसे गणपतिनाग, नागसेन) की मुद्राएँ और शिलालेख इस क्षेत्र में उनकी उपस्थिति दर्शाते हैं।

गुप्त राजवंश (लगभग तीसरी के अंत से छठी शताब्दी ईस्वी):

गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' माना जाता है। रीवा क्षेत्र गुप्त साम्राज्य का महत्वपूर्ण अंग था। देउरकोठार के बौद्ध स्तूपों का इस काल में जीर्णोद्धार हुआ। बंधवगढ़ किला के आसपास से प्राप्त गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएँ, कलात्मक प्रस्तर प्रतिमाएँ (जैसे शेषशायी विष्णु) और मंदिर स्थापत्य के अवशेष गुप्तकालीन समृद्धि के प्रमाण हैं।

कल्चुरी राजवंश (मुख्यतः लगभग 8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी):

त्रिपुरी (जबलपुर के निकट) के कल्चुरी राजवंश का रीवा और बघेलखंड पर गहरा प्रभाव रहा। ये शैव धर्म के महान संरक्षक थे।

कल्चुरी कालीन कला का एक उत्कृष्ट नमूना (मंदिर स्थापत्य या मूर्तिशिल्प)

(चित्र: कल्चुरी कालीन कला का एक उत्कृष्ट नमूना, संभवतः बैजनाथ या नयागांव से।)

  • गुर्गी (Gurgi): रीवा जिले की गुढ़ तहसील में स्थित यह स्थल कल्चुरीकालीन शैव मठों, मंदिरों (जैसे रेहुटा दुर्ग के निकट), विशाल मूर्तियों और कलात्मक स्तंभों का केंद्र था। यहाँ मत्तमयूर शैव संप्रदाय के शैवाचार्य प्रभावशिव और प्रशांतशिव सक्रिय थे।
  • चन्द्रहे (Chandrahe): सोन नदी के तट पर (सीधी जिला), यह भी कल्चुरीकालीन शैव गतिविधियों का केंद्र था।
  • बैजनाथ (Baijnath): सिरमौर तहसील में स्थित यह स्थल कल्चुरीकालीन शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
  • नयागांव (Nayagaon): यहाँ से भी कल्चुरीकालीन शिव मंदिर और प्रतिमाएँ मिली हैं।

चंदेल और प्रतिहार राजवंश (लगभग 8वीं से 13वीं शताब्दी ईस्वी):

रीवा क्षेत्र कल्चुरियों के प्रभाव में होते हुए भी चंदेलों (कालिंजर-महोबा) और प्रतिहारों (कन्नौज) की सीमा पर स्थित होने के कारण इनके सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव से भी अछूता नहीं रहा।

3. गुर्गी: विभिन्न धर्मों का सांस्कृतिक उत्थान केंद्र एवं गाजी मियां का मजार – एक अद्भुत समन्वय

गुर्गी-महसांव, प्राचीन और मध्यकालीन रीवा की आत्मा का दर्पण है, जहाँ विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो भारतीय संस्कृति की समन्वयवादी प्रकृति का उत्कृष्ट उदाहरण है।

गुर्गी से प्राप्त प्राचीन मंदिर के खंडहर या मूर्ति

(चित्र: गुर्गी से प्राप्त प्राचीन मंदिर के अवशेष या जैन तीर्थंकर की प्रतिमा का अंश।)

हिन्दू धर्म की विविध धाराओं का संगम:

गुर्गी मुख्यतः शैव धर्म का महान केंद्र रहा (शैवाचार्य प्रभावशिव और प्रशांतशिव)। यहाँ शैव मठों और शिक्षा केन्द्रों का निर्माण हुआ। वैष्णव और शाक्त परंपरा के भी चिन्ह मिलते हैं।

जैन धर्म की उपस्थिति:

गुर्गी से तीर्थंकर पार्श्वनाथ की खंडित प्रतिमा और नौवीं शती की कात्योत्सर्ग मुद्रा में तीर्थंकर की मूर्ति मिली है (अब प्रयागराज संग्रहालय में), जो यहाँ जैन धर्म की प्राचीन उपस्थिति को प्रमाणित करती है।

बौद्ध धर्म के पदचिह्न:

कुछ विद्वान गुर्गी के आसपास कौशाम्बी के विस्तारित प्रभाव क्षेत्र की संभावना व्यक्त करते हैं। राजा कर्णदेव द्वारा निर्मित रेहुटा दुर्ग ऐसे स्थानों पर विभिन्न धार्मिक समुदायों के सह-अस्तित्व का संकेत देता है।

सूफी संत गाजी मियां का मजार: सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक:

यहाँ हजरत सैय्यद सालार मसऊद गाजी मियां का एक प्रतीकात्मक मजार शरीफ स्थित है। इनका मुख्य मजार बहराइच (उ.प्र.) में है। गुर्गी में प्रतिवर्ष 25 मई को उर्स (मेला) का आयोजन होता है, जिसमें हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्मों के लोग श्रद्धापूर्वक शामिल होते हैं। यह सांप्रदायिक सौहार्द का जीवंत उदाहरण है। मेजर सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी रीवा राज्य के अनेक प्राचीन स्थलों का वर्णन किया था।

गुर्गी का यह मजार विभिन्न आस्थाओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और भारतीय संस्कृति की समन्वयवादी प्रकृति का प्रतीक है, जो आज भी हमें प्रेरणा देता है।

4. पुरातात्त्विक साक्ष्य एवं प्रमुख स्थल: अतीत के मौन गवाक्ष

रीवा और इसके चतुर्दिक विस्तृत क्षेत्र पुरातात्त्विक दृष्टि से एक खजाने के समान है, जहाँ धरती के गर्भ में और सतह पर बिखरे अवशेष अतीत की अनगिनत कहानियाँ कहते हैं:

  • देउरकोठार (Deur Kothar): सिरमौर तहसील। मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप, विहार, अशोककालीन ब्राह्मी शिलालेख।
  • गुर्गी-महसांव (Gurgi-Mahsanw): गुढ़ तहसील। कल्चुरीकालीन मंदिर, मूर्तियाँ, मठ, रेहुटा दुर्ग, जैन प्रतिमाएँ, गाजी मियां का मजार।
  • इटहा (Itaha): रीवा तहसील। चेदि महाजनपद की राजधानी सुक्तिमती का संभावित स्थल।
  • बैजनाथ (Baijnath): सिरमौर तहसील। कल्चुरीकालीन शिव मंदिर।
  • नयागांव (Nayagaon): कल्चुरीकालीन शिव मंदिर और प्रतिमाएँ।
  • बंधवगढ़ (Bandhavgarh): उमरिया जिला (पूर्व रीवा रियासत)। प्राचीन किला, गुफाएँ, गुप्तकालीन शेषशायी विष्णु, मघ एवं कल्चुरी अवशेष।
    बंधवगढ़ किले का एक विहंगम दृश्य या किले के भीतर की महत्वपूर्ण संरचना

    (चित्र: बंधवगढ़ किले का एक विहंगम दृश्य, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाता है।)

  • गोविंदगढ़ (Govindgarh): गुढ़ तहसील। प्रागैतिहासिक शैल चित्र, प्राचीन झील, किला।
    गोविंदगढ़ क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्र का एक उदाहरण

    (चित्र: गोविंदगढ़ या कैमूर श्रृंखला के किसी शैलाश्रय के प्रागैतिहासिक शैलचित्र।)

  • चन्द्रहे (Chandrahe): सीधी जिला (रीवा के निकट)। कल्चुरीकालीन शैव मठ।

समीपस्थ महत्वपूर्ण क्षेत्र: रीवा के ऐतिहासिक परिदृश्य के विस्तार

मऊगंज (Mauganj): (अब जिला)। सेंगर और बघेल राजवंशों से संबंधित। बहुती जलप्रपात, नई गढ़ी का किला।

जवा तहसील के अन्य ग्राम: कोलगढ़ी, अतरैला, डभौरा। कोल संस्कृति और स्थानीय लोक परंपराओं के केंद्र।

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यह लेखमाला "रीवा और बघेलखण्ड का समग्र इतिहास" की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। हमारा उद्देश्य इस पवित्र भूमि के गौरवशाली अतीत की अनकही कहानियों को आप तक पहुँचाना है।

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रीवा का प्रारंभिक काल: मुख्य अवधारणाएँ एवं सांस्कृतिक तत्व

"वनवासी सभ्यताएँ (Indigenous Cultures)": कोल और गोंड जैसी प्राचीन जनजातियाँ, जिनकी जीवनशैली प्रकृति से अभिन्न रूप से जुड़ी थी, और जिन्होंने रीवा की सांस्कृतिक नींव रखी।

उनकी लोककलाएँ, नृत्य (करमा, सैला) और मौखिक परंपराएँ आज भी जीवंत हैं और क्षेत्र की पहचान हैं।

"पूर्ववर्ती राजवंश (Pre-Baghel Dynasties)": चेदि (महाभारतकालीन), मौर्य (अशोककालीन देउरकोठार), नाग, गुप्त (स्वर्णयुगीन कला), और कल्चुरी (गुर्गी के शैव मठ)।

इन राजवंशों ने रीवा की राजनीतिक, धार्मिक और कलात्मक विरासत को समृद्ध किया और बघेलों के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार की।

"बहु-सांस्कृतिक संगम (Multi-cultural Confluence)": शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध और सूफी परंपराओं का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, जैसा कि गुर्गी में परिलक्षित होता है।

यह समन्वय रीवा की सांस्कृतिक जीवंतता और सहिष्णुता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

"पुरातात्त्विक धरोहर (Archaeological Treasures)": देउरकोठार के स्तूप, इटहा की प्राचीनता, बंधवगढ़ का किला, गोविंदगढ़ के शैलचित्र, और गुर्गी के मंदिर अवशेष।

ये स्थल रीवा के हजारों वर्षों के इतिहास के मूक साक्षी हैं और शोध तथा संरक्षण की अपेक्षा रखते हैं।

रीवा की प्राचीन विरासत: एक दृश्य

देउरकोठार स्थित मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप या उसके अवशेषों की स्पष्ट तस्वीर

(चित्र: देउरकोठार के मौर्यकालीन बौद्ध स्तूपों का एक दृश्य। साभार: ASI/संबंधित स्रोत)

गुर्गी का पुरातात्त्विक महत्व (वृत्तचित्र अंश)

(यह एक उदाहरण वीडियो है। आप गुर्गी या रीवा के अन्य प्राचीन स्थलों पर किसी जानकारीपूर्ण वृत्तचित्र का वास्तविक YouTube VIDEO_ID डाल सकते हैं।)

अध्ययन स्रोत एवं संदर्भ ग्रंथ (विस्तारित)

रीवा के प्रारंभिक काल, वनवासी सभ्यताओं, प्राचीन राजवंशों और बहु-सांस्कृतिक विरासत के गहन अध्ययन के लिए निम्नलिखित स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

प्राथमिक पुरातात्त्विक एवं साहित्यिक स्रोत:

  • **शैलाश्रय एवं शैलचित्र:** गोविंदगढ़, कैमूर श्रृंखला के विभिन्न स्थल।
  • **पाषाण उपकरण:** रीवा, सीधी, सतना, शहडोल जिलों की नदी घाटियों से प्राप्त।
  • **पुराण:** स्कंद पुराण (रेवा-खंड), मत्स्य पुराण, वायु पुराण, ब्रह्म पुराण।
  • **महाकाव्य:** रामायण (बंधवगढ़ का उल्लेख), महाभारत (चेदि महाजनपद, सुक्तिमती)।
  • **बौद्ध एवं जैन ग्रंथ:** अंगुत्तर निकाय (चेदि), आवश्यक सूत्र आदि।
  • **अभिलेख:** देउरकोठार (अशोककालीन ब्राह्मी), गुर्गी (कल्चुरी), बंधवगढ़ (गुप्त, मघ)।
  • **मूर्तियाँ एवं मंदिर अवशेष:** गुर्गी, देउरकोठार, बंधवगढ़, बैजनाथ, नयागांव।

आधुनिक शोध एवं प्रकाशन:

/* --- प्रमुख आधुनिक संदर्भ ग्रंथ एवं शोध (उदाहरण) --- */
सिंह, जीतन. "रीवा राज्य का दर्पण". (पृ. 394, 395 - गुर्गी संदर्भ)
शुक्ल, डॉ. हीरा लाल. "बघेलखण्ड की संस्कृति और भाषा". (पृ. 90)
श्रीवास्तव, प्रो. राधेशरण. "विंध्य क्षेत्र का इतिहास". (पृ. 264)
वाजपेयी, श्रीमती मधुलिका. "मध्य प्रदेश में जैन धर्म का विकास". (पृ. 127 - गुर्गी जैन मूर्ति)
सक्सेना, के.एम. "रीवा स्टेट डायरेक्ट्री". (पृ. 59 - प्रकाशन काल्पनिक)
अशरफी, जिया अली खाँ. "किताब मरदाने खुदा (औलिया-ए-हिन्द पर विशेष)". (पृ. 58-60 - गाजी मियां)
Directorate of Archaeology, Archives and Museums, Govt. of M.P. - प्रकाशन।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) - रिपोर्टें (देउरकोठार, गुर्गी)।
Bajpai, K.D. (1980). "History and Culture of Madhya Pradesh".
Trivedi, H.V. (1957). "Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol. III: Inscriptions of the Kalachuri-Chedi Era".
Misra, V.N. (2001). "Prehistoric Human Colonization of India". Journal of Biosciences.
Tripathi, Vibha. (2001). "The Age of Iron in South Asia: Legacy and Tradition".
Chakrabarti, Dilip K. (2006). "The Oxford Companion to Indian Archaeology".

वेबसाइट एवं अन्य डिजिटल स्रोत:

  • जिला रीवा एवं जिला मऊगंज की आधिकारिक वेबसाइटें (इतिहास एवं पर्यटन खंड)।
  • Villageinfo.in (अतरैला, डभौरा जैसे ग्रामों की जानकारी हेतु)।
  • विकिपीडिया (Rewa district, Rewa princely state, Mauganj district)।
  • मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम (MPTDC) की वेबसाइट।

निष्कर्ष: एक बहुआयामी विरासत का पुनरावलोकन और भविष्य की दिशा

रीवा का बघेल-पूर्व इतिहास एक बहुरंगी चादर के समान है, जिसके प्रत्येक धागे में एक अलग कहानी, एक अलग संस्कृति और एक अलग परंपरा गुंथी हुई है। यह क्षेत्र मात्र राजवंशों के उत्थान-पतन का साक्षी नहीं रहा, बल्कि यह चेदि, मौर्य, नाग, गुप्त और कल्चुरी जैसी महान राजनीतिक सत्ताओं की प्रशासनिक क्षमता, कलात्मक संरक्षण और धार्मिक नीतियों का क्रियान्वयन स्थल भी रहा। इन राजवंशों ने यहाँ भव्य मंदिर, विशाल स्तूप, सुदृढ़ किले और कलात्मक प्रतिमाएँ निर्मित कर अपनी स्थायी विरासत छोड़ी। परंतु इस राजकीय इतिहास के समानांतर, यहाँ की भूमि कोल, गोंड, लोधी और लवाना जैसी जनजातीय और जातीय संरचनाओं की जीवंत सामाजिक चेतना और उनकी प्रकृति-सहज जीवनशैली से सिंचित होती रही। गुर्गी जैसे अद्वितीय स्थल विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और समन्वय का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। देउरकोठार के अशोककालीन बौद्ध स्तूप, इटहा की महाभारतकालीन प्राचीनता, बंधवगढ़ का किला और गोविंदगढ़ के प्रागैतिहासिक शैल चित्र इस क्षेत्र की गहन और निरंतर ऐतिहासिक परतों को उजागर करते हैं। वस्तुतः, रीवा की यह अद्भुत विविधता, इसकी समावेशी सांस्कृतिक विरासत और विभिन्न मानव समूहों के बीच सह-अस्तित्व की लंबी परंपरा ही इसकी वास्तविक धरोहर और शक्ति है। इस बहुमूल्य धरोहर का संरक्षण, संवर्धन और इसके गहन अध्ययन की आज महती आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपने गौरवशाली अतीत से परिचित हो सकें और भविष्य के लिए प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

कॉपीराइट एवं उपयोग अधिकार

यह प्रस्तुति "रीवा का प्रारंभिक काल: वनवासी सभ्यताएँ, प्राचीन राजवंश एवं बहु-सांस्कृतिक विरासत की गहन पड़ताल" ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। सामग्री का उपयोग गैर-व्यावसायिक, शैक्षिक, और शोधपरक गतिविधियों के लिए, शोध एवं संपादन: "आचार्य आशीष मिश्र" (acharyaasheeshmishra.blogspot.com) के उचित श्रेय के साथ किया जा सकता है।

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत जानकारी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, शोध-पत्रों और विद्वानों के कार्यों पर आधारित है। ऐतिहासिक तिथियों और व्याख्याओं में भिन्नता संभव है। पाठकों से अनुरोध है कि वे गहन अध्ययन के लिए मूल संदर्भ ग्रंथों का अवलोकन करें। अधिक जानकारी के लिए हमारे ब्लॉग पर प्रारंभिक रीवा, वनवासी संस्कृति, तथा प्राचीन राजवंश लेबल देखें।

© रीवा का अतीत, भारत का गौरव। अन्वेषण जारी रखें।

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